मोहनजोदड़ो: किसने और कब की थी इस महान सभ्यता की खोज?
नमस्ते मेरे प्यारे पाठकों! आज हम इतिहास के एक बेहद महत्वपूर्ण और रोमांचक अध्याय पर चर्चा करने जा रहे हैं। आप जानना चाहते हैं कि मोहनजोदड़ो की खोज किसने और कब की थी, और इस प्राचीन शहर ने भारतीय इतिहास को किस तरह से बदला। यह सिर्फ एक साधारण सवाल नहीं है, बल्कि एक पूरी सभ्यता के अनावरण की कहानी है, जिसने हमें हमारी जड़ों और प्राचीन भारतीय समाज की अद्भुत प्रगति से परिचित कराया। आइए, इस महान सिंधु घाटी सभ्यता के सबसे प्रमुख शहर मोहनजोदड़ो के रहस्यों को उजागर करें और इसके खोजकर्ता के बारे में विस्तार से जानें। हम इस ऐतिहासिक खोज के महत्व और मोहनजोदड़ो की अनूठी विशेषताओं पर भी गहराई से प्रकाश डालेंगे।
सही उत्तर
मोहनजोदड़ो की खोज प्रसिद्ध भारतीय पुरातत्वविद् राखालदास बनर्जी ने वर्ष 1922 में की थी।
विस्तृत व्याख्या
मोहनजोदड़ो, जिसे 'मृतकों का टीला' भी कहा जाता है, सिंधु घाटी सभ्यता का एक अत्यंत महत्वपूर्ण और सुनियोजित शहरी केंद्र था। इसकी खोज ने भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास को लगभग 2500 ईसा पूर्व तक पीछे धकेल दिया, यह साबित करते हुए कि वैदिक काल से भी पहले भारत में एक उन्नत शहरी सभ्यता मौजूद थी। यह खोज न केवल भारत के लिए, बल्कि विश्व पुरातत्व के लिए भी एक मील का पत्थर साबित हुई।
मोहनजोदड़ो के खोजकर्ता: राखालदास बनर्जी
मोहनजोदड़ो की खोज का श्रेय राखालदास बनर्जी को जाता है, जो भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (Archaeological Survey of India – ASI) के एक कुशल अधिकारी थे। 1922 में, जब बनर्जी सिंध प्रांत (जो अब पाकिस्तान में है) के लरकाना जिले में स्थित बौद्ध स्तूपों का सर्वेक्षण कर रहे थे, तो उन्हें खुदाई के दौरान कुछ प्राचीन अवशेष मिले। इन अवशेषों में मिट्टी के बर्तन, मुहरें और ईंटें शामिल थीं, जो उस क्षेत्र में पहले मिली वस्तुओं से बिल्कुल अलग थीं।
प्रारंभ में, उन्हें यह अहसास नहीं था कि वे एक पूरी तरह से नई सभ्यता के अवशेषों पर बैठे हैं। उन्होंने सर जॉन मार्शल को, जो उस समय ASI के महानिदेशक थे, इस बारे में सूचित किया। बनर्जी के शुरुआती निष्कर्षों और उनके द्वारा प्राप्त सामग्रियों के आधार पर, यह स्पष्ट होने लगा कि यह केवल एक स्थानीय संस्कृति नहीं, बल्कि एक व्यापक और विकसित सभ्यता का हिस्सा था। उनकी यह प्रारंभिक पहचान ही मोहनजोदड़ो के विस्तृत उत्खनन का आधार बनी।
सिंधु घाटी सभ्यता और इसकी खोज का संदर्भ
मोहनजोदड़ो की खोज, वास्तव में, सिंधु घाटी सभ्यता के व्यापक अनावरण का हिस्सा थी। इससे एक साल पहले, 1921 में, दयाराम साहनी ने पंजाब प्रांत में हड़प्पा नामक स्थल की खोज की थी। हड़प्पा भी सिंधु नदी प्रणाली के किनारे स्थित एक और बड़ा प्राचीन शहर था। जब मोहनजोदड़ो की खोज हुई और दोनों स्थलों से प्राप्त वस्तुओं में समानताएं पाई गईं, तो सर जॉन मार्शल ने 1924 में आधिकारिक तौर पर 'सिंधु घाटी सभ्यता' नामक एक नई प्राचीन सभ्यता की घोषणा की। यह घोषणा विश्व इतिहास में एक क्रांतिकारी क्षण था, क्योंकि इसने मेसोपोटामिया और मिस्र के साथ-साथ एक और प्राचीन नदी घाटी सभ्यता के अस्तित्व को प्रमाणित किया।
मोहनजोदड़ो – मृतकों का टीला
'मोहनजोदड़ो' शब्द का सिंधी भाषा में अर्थ है 'मृतकों का टीला' (Mound of the Dead)। यह नाम इस बात का प्रमाण है कि जब आधुनिक युग में इसकी खोज हुई, तो यह एक विशाल टीले के रूप में मौजूद था, जिसके नीचे एक महानगरीय सभ्यता दबी हुई थी। यह शहर सिंधु नदी के दाहिने किनारे पर, वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित था। इसकी अनुमानित अवधि 2500 ईसा पूर्व से 1900 ईसा पूर्व मानी जाती है।
मोहनजोदड़ो की अद्वितीय विशेषताएं
मोहनजोदड़ो की खुदाई से पता चला कि यह अपनी वास्तुकला, नगर नियोजन और जल प्रबंधन प्रणाली में असाधारण रूप से उन्नत था। यहाँ कुछ प्रमुख विशेषताएं दी गई हैं:
- सुनियोजित नगर संरचना: शहर को दो मुख्य भागों में बांटा गया था: गढ़ (दुर्ग) और निचला शहर। गढ़ में महत्वपूर्ण सार्वजनिक भवन और धार्मिक संरचनाएँ थीं, जबकि निचले शहर में आम नागरिकों के आवासीय घर थे। शहर एक ग्रिड पैटर्न पर बना था, जिसमें सड़कें सीधी थीं और एक-दूसरे को समकोण पर काटती थीं। यह नियोजन आधुनिक शहरी नियोजन को भी चुनौती देता है।
- विशाल स्नानागार (The Great Bath): यह मोहनजोदड़ो की सबसे प्रभावशाली संरचनाओं में से एक है। यह एक बड़ा आयताकार जलाशय था, जो पकी हुई ईंटों से बना था और इसमें पानी के रिसाव को रोकने के लिए बिटुमिनस परत का उपयोग किया गया था। इसमें उतरने के लिए सीढ़ियाँ थीं और बगल में छोटे कमरे भी बने थे। ऐसा माना जाता है कि इसका उपयोग धार्मिक अनुष्ठानों या सामूहिक स्नान के लिए किया जाता था।
- विशाल अन्नागार (The Great Granary): गढ़ के पास एक और महत्वपूर्ण संरचना एक विशाल अन्नागार थी, जिसका उपयोग अनाज के भंडारण के लिए किया जाता था। यह दर्शाता है कि शहर में एक केंद्रीकृत अर्थव्यवस्था और कृषि अधिशेष का प्रबंधन था।
- उन्नत जल निकासी प्रणाली: मोहनजोदड़ो की सबसे उल्लेखनीय विशेषताओं में से एक इसकी अत्यधिक कुशल जल निकासी प्रणाली थी। प्रत्येक घर में अपने शौचालय और स्नानघर होते थे, जिनका पानी ढकी हुई नालियों के माध्यम से मुख्य नालियों में जाता था। ये नालियाँ ईंटों से ढकी होती थीं और समय-समय पर सफाई के लिए मैनहोल भी बने होते थे। यह उस समय के लिए एक असाधारण उपलब्धि थी और स्वच्छता के प्रति उनके उच्च स्तर की जागरूकता को दर्शाता है।
- आवासीय भवन: निचले शहर में आवासीय घर पकी हुई ईंटों से बने थे और आमतौर पर दो या अधिक मंजिल के होते थे। अधिकांश घरों में एक केंद्रीय आंगन, रसोई और कुआँ होता था। कुछ घरों में तो निजी कुएँ भी थे, जो पानी की उपलब्धता और प्रबंधन पर उनके ध्यान को दर्शाता है।
- शिल्प और कला: मोहनजोदड़ो से विभिन्न प्रकार की कलाकृतियाँ मिली हैं, जिनमें मिट्टी की मूर्तियाँ, टेराकोटा की मुहरें, धातु की वस्तुएँ और आभूषण शामिल हैं। यहाँ से मिली 'नृत्य करती हुई लड़की' (Dancing Girl) की कांस्य प्रतिमा और 'पशुपति मुहर' (Pashupati Seal) विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। मुहरों पर अक्सर जानवरों के चित्र और एक अज्ञात लिपि खुदी होती थी, जिसे आज तक पढ़ा नहीं जा सका है।
- सामाजिक और आर्थिक जीवन: साक्ष्यों से पता चलता है कि मोहनजोदड़ो एक समृद्ध व्यापारिक और कृषि प्रधान समाज था। वे कृषि उत्पादों के साथ-साथ कपड़े, मनके और धातुओं का व्यापार करते थे। बाट और माप की एक मानकीकृत प्रणाली का उपयोग किया जाता था, जो उनके व्यापारिक नेटवर्क की जटिलता को दर्शाता है। समाज में संभवतः विभिन्न वर्ग थे, जिसमें शासक वर्ग, व्यापारी, शिल्पकार और किसान शामिल थे।
मोहनजोदड़ो की खोज का महत्व
मोहनजोदड़ो की खोज ने भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास और पुरातत्व पर गहरा प्रभाव डाला। इसके कुछ प्रमुख महत्व इस प्रकार हैं:
- भारतीय इतिहास का पुनरीक्षण: इसने यह सिद्ध किया कि भारत का इतिहास वेदों और आर्यों के आगमन से कहीं अधिक प्राचीन है। यह एक पूर्व-आर्य शहरी सभ्यता थी, जिसने भारतीय इतिहास के कालक्रम को पूरी तरह से बदल दिया।
- वैश्विक संदर्भ में स्थान: मोहनजोदड़ो और सिंधु घाटी सभ्यता ने भारत को मिस्र और मेसोपोटामिया जैसी अन्य महान प्राचीन सभ्यताओं के बराबर खड़ा किया। इसने दिखाया कि भारतीय उपमहाद्वीप भी मानव सभ्यता के विकास में एक प्रमुख केंद्र था।
- उन्नत शहरीकरण का प्रमाण: यह खोज प्राचीन दुनिया में एक ऐसी सभ्यता के अस्तित्व का प्रमाण थी, जिसने नगर नियोजन, स्वच्छता और जल प्रबंधन में अद्वितीय दक्षता हासिल की थी, जो कई मायनों में आधुनिक शहरों से भी प्रेरणा ले सकती है।
- आगे की खोजों का मार्ग प्रशस्त किया: मोहनजोदड़ो और हड़प्पा की खोजों ने भारतीय पुरातत्वविदों को पूरे सिंधु नदी बेसिन और उससे आगे भी इसी तरह के स्थलों की खोज करने के लिए प्रेरित किया। परिणामस्वरूप, कालीबंगा, लोथल, धोलावीरा और राखीगढ़ी जैसे सैकड़ों अन्य सिंधु घाटी स्थल प्रकाश में आए।
- सांस्कृतिक निरंतरता: यद्यपि सिंधु घाटी सभ्यता का पतन हो गया, लेकिन इसके कुछ सांस्कृतिक और धार्मिक पहलू, जैसे कि देवी पूजा, योगिक मुद्राएं और कुछ प्रतीकात्मकता, बाद की भारतीय संस्कृतियों में निरंतरता के संकेत देती हैं।
मोहनजोदड़ो का पतन
लगभग 1900 ईसा पूर्व तक, सिंधु घाटी सभ्यता, जिसमें मोहनजोदड़ो भी शामिल था, का पतन होना शुरू हो गया। इस पतन के कारणों को लेकर इतिहासकारों में अभी भी बहस जारी है। कुछ प्रमुख सिद्धांत इस प्रकार हैं:
- जलवायु परिवर्तन: यह माना जाता है कि सिंधु नदी के मार्ग में परिवर्तन या वर्षा पैटर्न में बदलाव से कृषि पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा, जिससे शहरों को बनाए रखना मुश्किल हो गया।
- नदी मार्ग में बदलाव: सिंधु नदी अपने मार्ग बदलने के लिए जानी जाती है। हो सकता है कि नदी शहर से दूर चली गई हो या बाढ़ ने शहर को तबाह कर दिया हो।
- आक्रमण: कुछ शुरुआती सिद्धांतों में आर्यों के आक्रमण को पतन का कारण बताया गया, लेकिन इस सिद्धांत के पक्ष में ठोस पुरातात्विक साक्ष्य कम हैं।
- पर्यावरणीय क्षरण: वनों की कटाई और अत्यधिक चराई के कारण पारिस्थितिक संतुलन बिगड़ गया हो सकता है।
- महामारी: कुछ विद्वानों का मानना है कि किसी बड़ी महामारी ने भी जनसंख्या को प्रभावित किया हो सकता है।
मुख्य निष्कर्ष
- मोहनजोदड़ो की खोज राखालदास बनर्जी ने वर्ष 1922 में की थी।
- यह सिंधु घाटी सभ्यता का दूसरा सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण खोजा गया शहर था, जो वर्तमान पाकिस्तान के सिंध प्रांत में स्थित है।
- मोहनजोदड़ो अपनी अद्वितीय नगर योजना, उन्नत जल निकासी प्रणाली और विशाल स्नानागार के लिए प्रसिद्ध है।
- इसकी खोज ने भारतीय इतिहास को हजारों साल पीछे धकेल दिया और यह साबित किया कि भारत में एक अत्यधिक विकसित शहरी सभ्यता मौजूद थी, जो विश्व की अन्य प्राचीन सभ्यताओं के समकालीन थी।
- मोहनजोदड़ो से प्राप्त कलाकृतियाँ और संरचनाएँ उस समय के सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन पर महत्वपूर्ण प्रकाश डालती हैं।
मुझे उम्मीद है कि इस विस्तृत व्याख्या से आपको मोहनजोदड़ो की खोज और इसके महत्व के बारे में गहन जानकारी मिली होगी। यह सिर्फ एक पुरातात्विक खोज नहीं, बल्कि हमारी साझा मानवीय विरासत का एक गौरवशाली अध्याय है।