AITUC की स्थापना: तिथि, कारण और महत्व

by Olex Johnson 38 views

नमस्ते दोस्तों! क्या आप जानना चाहते हैं कि भारत के श्रमिक आंदोलन में मील का पत्थर मानी जाने वाली अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना कब हुई? यह सवाल न केवल प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि भारतीय इतिहास और श्रमिक अधिकारों को समझने के लिए भी बेहद आवश्यक है। इस विस्तृत लेख में, हम आपको AITUC की स्थापना की सही तिथि बताने के साथ-साथ, इसके पीछे के कारणों, संस्थापक सदस्यों और भारतीय श्रमिक वर्ग पर इसके गहरे प्रभाव पर भी प्रकाश डालेंगे। हमारा उद्देश्य आपको इस विषय पर एक स्पष्ट, विस्तृत और सटीक जानकारी प्रदान करना है। तो चलिए, बिना किसी देरी के इस महत्वपूर्ण संगठन के इतिहास में गोता लगाते हैं।

सही उत्तर

अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना 31 अक्टूबर, 1920 को मुंबई (तत्कालीन बंबई) में हुई थी।

विस्तृत व्याख्या

अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की स्थापना भारत के श्रमिक आंदोलन के इतिहास में एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना थी। यह केवल एक संगठन का जन्म नहीं था, बल्कि भारतीय श्रमिकों की बढ़ती चेतना और उनके अधिकारों के लिए संगठित संघर्ष की शुरुआत का प्रतीक था। इसकी स्थापना 31 अक्टूबर, 1920 को मुंबई में लाला लाजपत राय की अध्यक्षता में हुई थी, जो उस समय के एक प्रमुख राष्ट्रवादी नेता थे।

स्थापना के कारण और पृष्ठभूमि

AITUC की स्थापना के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण और ऐतिहासिक परिस्थितियाँ थीं, जिन्होंने भारतीय श्रमिक वर्ग को एकजुट होने के लिए प्रेरित किया:

  1. प्रथम विश्व युद्ध का प्रभाव: प्रथम विश्व युद्ध (1914-1918) ने भारतीय अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला था। युद्ध के दौरान वस्तुओं की कीमतें तेजी से बढ़ीं, जबकि श्रमिकों की मजदूरी में कोई खास वृद्धि नहीं हुई। इससे श्रमिकों का जीवन स्तर गिर गया और उनमें असंतोष पनपने लगा। मिलों और कारखानों में काम के घंटे लंबे थे, सुरक्षा मानकों का अभाव था, और मजदूरी बहुत कम थी। इस आर्थिक दबाव ने श्रमिकों को अपने अधिकारों के लिए संगठित होने की प्रेरणा दी। शहरी औद्योगिक केंद्रों में श्रमिकों की संख्या में वृद्धि हुई, लेकिन उनके जीवन और कार्य की परिस्थितियाँ अत्यंत दयनीय थीं, जिससे सामूहिक कार्यवाही की आवश्यकता महसूस हुई।

  2. रूसी क्रांति (1917) का प्रभाव: रूस में 1917 की बोल्शेविक क्रांति ने दुनिया भर के श्रमिकों और समाजवादी विचारकों को प्रेरित किया। इसने दिखाया कि संगठित श्रमिक वर्ग सत्ता को चुनौती दे सकता है और अपने अधिकारों के लिए लड़ सकता है। भारत में भी इस क्रांति की गूँज सुनाई दी और श्रमिक वर्ग में नई ऊर्जा का संचार हुआ। साम्यवादी विचारों का प्रसार होने लगा, जिसमें वर्ग संघर्ष और श्रमिक अधिकारों पर जोर दिया गया था। इसने भारतीय बुद्धिजीवियों और श्रमिक नेताओं को संगठित होकर अपने शोषण के खिलाफ आवाज उठाने के लिए प्रोत्साहित किया।

  3. अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) का गठन: 1919 में वर्साय की संधि के तहत अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) की स्थापना हुई थी। ILO में सदस्य देशों के लिए यह अनिवार्य था कि वे अपने देश के श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठनों को नामांकित करें। भारत को भी ILO में अपना प्रतिनिधित्व भेजने के लिए एक केंद्रीय श्रमिक संगठन की आवश्यकता महसूस हुई। ब्रिटिश सरकार ने भी महसूस किया कि एक केंद्रीय संगठन के बिना, ILO में भारत का प्रतिनिधित्व करना मुश्किल होगा। यह एक अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय श्रमिकों की आवाज पहुंचाने का अवसर था, जिसे भुनाने के लिए एक संगठित राष्ट्रीय मंच की आवश्यकता थी।

  4. गांधीजी का प्रभाव और प्रारंभिक श्रमिक आंदोलन: महात्मा गांधी ने चंपारण (1917), अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918) और खेड़ा सत्याग्रह (1918) जैसे आंदोलनों के माध्यम से श्रमिकों और किसानों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया था। उनकी अहिंसक संघर्ष की पद्धति ने भी श्रमिकों को प्रेरणा दी। 1918-1920 के दौरान भारत में कई स्थानीय ट्रेड यूनियनों का गठन हुआ था, लेकिन उन्हें एक केंद्रीय मंच की आवश्यकता थी। गांधीजी ने श्रमिकों को एकजुट करने और उनके साथ न्याय दिलाने के लिए अथक प्रयास किए, जिससे राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े श्रमिक संगठन की नींव पड़ी।

  5. राष्ट्रवादी नेताओं का सहयोग: उस समय के कई प्रमुख राष्ट्रवादी नेताओं ने महसूस किया कि स्वतंत्रता संग्राम में श्रमिकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। लाला लाजपत राय, महात्मा गांधी, बाल गंगाधर तिलक, एन.एम. जोशी, दीवान चमन लाल, और सी.आर. दास जैसे नेताओं ने श्रमिक आंदोलन को अपना समर्थन दिया। उन्होंने समझा कि श्रमिकों के मुद्दों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ना आवश्यक है। इन नेताओं ने श्रमिक वर्ग को स्वतंत्रता आंदोलन का एक अभिन्न अंग माना, जिससे उनकी भागीदारी और चेतना में वृद्धि हुई। वे यह भी मानते थे कि भारत की मुक्ति के लिए श्रमिकों का सशक्तिकरण आवश्यक है।

  6. आर्थिक शोषण और औद्योगिक असंतोष: ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के तहत भारतीय श्रमिकों का व्यापक शोषण हो रहा था। उन्हें कम मजदूरी पर लंबे समय तक काम कराया जाता था, बिना किसी सामाजिक सुरक्षा या उचित कार्य परिस्थितियों के। कारखानों में खतरनाक माहौल, बाल श्रम, और महिलाओं के लिए अनुपयुक्त परिस्थितियाँ आम थीं। इस शोषण के खिलाफ एकजुट होकर आवाज़ उठाना अनिवार्य हो गया था। देश भर में बढ़ती औद्योगिक अशांति और लगातार होने वाली हड़तालों ने एक केंद्रीय निकाय की आवश्यकता को स्पष्ट कर दिया, जो इन असंतोषों को एक संगठित दिशा दे सके।

AITUC की स्थापना सभा

AITUC की स्थापना सभा 31 अक्टूबर, 1920 को मुंबई के एमप्रेस थिएटर में आयोजित की गई थी। इस ऐतिहासिक सभा में देश भर से लगभग 100 से अधिक ट्रेड यूनियनों के प्रतिनिधि और लगभग 14,000 श्रमिक उपस्थित थे। यह भारत में श्रमिक एकता का एक अभूतपूर्व प्रदर्शन था और इसने भविष्य के श्रमिक आंदोलनों की दिशा तय की।

  • अध्यक्षता: इस सभा की अध्यक्षता लाला लाजपत राय ने की थी। उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में श्रमिकों के अधिकारों, साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष और अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक एकजुटता पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि "पूंजीवाद और साम्राज्यवाद के गठबंधन का मुकाबला करने के लिए, भारत के श्रमिकों को एकजुट होना होगा।" उनका भाषण भारतीय श्रमिकों के लिए एक प्रेरक उद्बोधन था, जिसने उन्हें अपने शोषण के खिलाफ उठ खड़े होने का आह्वान किया।

  • संस्थापक सदस्य और प्रमुख नेता: AITUC की स्थापना में कई दूरदर्शी नेताओं का योगदान था। इनमें से कुछ प्रमुख नाम हैं:

    • लाला लाजपत राय: पहले अध्यक्ष। वे एक प्रमुख राष्ट्रवादी और विचारक थे, जिन्होंने श्रमिकों के अधिकारों को राष्ट्रीय स्वतंत्रता के साथ जोड़ा।
    • दीवान चमन लाल: पहले महासचिव। उन्होंने संगठन के प्रारंभिक ढांचे को स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
    • एन.एम. जोशी (नारायण मल्हार जोशी): जिन्हें भारत में आधुनिक श्रमिक आंदोलन का जनक माना जाता है। उन्होंने श्रमिकों के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष किया और कई सामाजिक सुधारों की वकालत की।
    • जोसेफ बैपटिस्टा: जिन्होंने बॉम्बे मिलहैंड्स एसोसिएशन का नेतृत्व किया था और श्रमिक अधिकारों के लिए मुखर थे।
    • बाल गंगाधर तिलक: हालांकि उनकी मृत्यु AITUC की स्थापना से ठीक पहले (अगस्त 1920) हो गई थी, लेकिन उन्होंने AITUC के गठन का समर्थन किया था और इसे अपनी शुभकामनाएं दी थीं। उनका राष्ट्रवाद श्रमिकों के हितों से जुड़ा था।
    • अन्य प्रमुख राष्ट्रवादी नेता: जैसे मोतीलाल नेहरू, विट्ठलभाई पटेल, श्रीमती एनी बेसेंट और अन्य ने भी इस आंदोलन को अपना समर्थन दिया, जिससे AITUC को व्यापक राष्ट्रीय स्वीकार्यता मिली।
  • उद्देश्य: AITUC की स्थापना के प्रमुख उद्देश्य थे:

    • भारत में ट्रेड यूनियनों को एकजुट करना और उन्हें एक राष्ट्रीय मंच प्रदान करना।
    • श्रमिकों के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक अधिकारों की रक्षा करना और उनके जीवन स्तर में सुधार लाना।
    • श्रमिकों की मजदूरी, काम के घंटे, कार्य परिस्थितियों, और सामाजिक सुरक्षा (जैसे पेंशन और स्वास्थ्य लाभ) में सुधार के लिए संघर्ष करना।
    • अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक आंदोलन के साथ समन्वय स्थापित करना और वैश्विक श्रमिक एकजुटता का हिस्सा बनना।
    • राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन में श्रमिकों की भूमिका को मजबूत करना और उन्हें साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष में सक्रिय रूप से शामिल करना।
    • श्रमिकों के बीच शिक्षा और जागरूकता फैलाना ताकि वे अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझ सकें।

AITUC का प्रारंभिक कार्य और प्रभाव

अपनी स्थापना के तुरंत बाद, AITUC ने भारतीय श्रमिक आंदोलन में एक केंद्रीय भूमिका निभानी शुरू कर दी। इसने न केवल श्रमिकों को एकजुट किया, बल्कि उनके मुद्दों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भी उठाया।

  • ILO में प्रतिनिधित्व: AITUC ने तुरंत ILO में भारत के श्रमिकों का प्रतिनिधित्व करना शुरू कर दिया, जिससे अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय श्रमिकों की आवाज़ सुनी जाने लगी। इसने ILO के सम्मेलनों और बैठकों में भाग लिया, भारतीय श्रमिकों के लिए बेहतर मानकों की वकालत की और अंतर्राष्ट्रीय श्रम कानूनों को भारत में लागू करने का दबाव बनाया।

  • हड़तालें और आंदोलन: AITUC ने श्रमिकों के शोषण के खिलाफ कई महत्वपूर्ण हड़तालों और आंदोलनों का नेतृत्व किया। इसने श्रमिकों को एकजुट होकर अपनी माँगें रखने के लिए एक मंच प्रदान किया। 1920 के दशक में, इसने रेलवे, कपड़ा मिलों और जूट उद्योगों में कई बड़ी हड़तालों का सफल नेतृत्व किया, जिससे मालिकों को श्रमिकों की मांगों पर ध्यान देने के लिए मजबूर होना पड़ा। ये हड़तालें न केवल आर्थिक सुधारों के लिए थीं, बल्कि औपनिवेशिक शोषण के खिलाफ प्रतिरोध का भी प्रतीक थीं।

  • कानूनी सुधारों की वकालत: AITUC ने श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी सुधारों की वकालत की। इसके अथक प्रयासों के परिणामस्वरूप, ब्रिटिश सरकार को 1926 में ट्रेड यूनियंस अधिनियम पारित करना पड़ा, जिसने ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता प्रदान की और उनके पंजीकरण के लिए नियम स्थापित किए। यह अधिनियम भारतीय श्रमिक आंदोलन की एक बड़ी जीत थी, क्योंकि इसने यूनियनों को कानूनी सुरक्षा दी और उन्हें बातचीत करने का अधिकार प्रदान किया। इसके बाद, श्रमिक क्षतिपूर्ति अधिनियम (1923), कारखाना अधिनियम (1922 में संशोधित) जैसे कई अन्य श्रमिक कल्याण कानूनों को भी पारित किया गया, जिसमें AITUC की भूमिका महत्वपूर्ण थी।

  • राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ाव: AITUC ने न केवल श्रमिक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित किया, बल्कि इसने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के साथ भी घनिष्ठ संबंध बनाए रखा। कई राष्ट्रवादी नेता AITUC से जुड़े थे और उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम को श्रमिक वर्ग के हितों से जोड़ा। AITUC ने सविनय अवज्ञा आंदोलन और असहयोग आंदोलन जैसे राष्ट्रव्यापी अभियानों में भी सक्रिय भूमिका निभाई, जिससे राष्ट्रीय स्वतंत्रता की लड़ाई में श्रमिक वर्ग की भागीदारी सुनिश्चित हुई।

  • समाजवादी विचारों का प्रसार: AITUC ने भारत में समाजवादी और साम्यवादी विचारों के प्रसार में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने श्रमिकों को उनके वर्ग हितों के प्रति जागरूक किया और उन्हें पूंजीवादी शोषण के खिलाफ एकजुट होने के लिए प्रेरित किया। AITUC के मंच से, श्रमिक नेताओं ने अंतर्राष्ट्रीय श्रमिक एकजुटता और समाज के अधिक न्यायपूर्ण पुनर्गठन की वकालत की।

AITUC का विभाजन और विकास

जैसे-जैसे श्रमिक आंदोलन परिपक्व होता गया, AITUC में विभिन्न विचारधाराओं के बीच मतभेद भी उत्पन्न हुए। ये मतभेद अक्सर राजनीतिक और वैचारिक दिशा को लेकर होते थे, जिसने संगठन के भीतर तनाव पैदा किया।

  • कम्युनिस्टों और राष्ट्रवादियों के बीच मतभेद: 1920 के दशक के अंत तक, AITUC में कम्युनिस्टों का प्रभाव बढ़ने लगा। उन्होंने अधिक रेडिकल (कट्टरपंथी) दृष्टिकोण अपनाया और श्रमिक आंदोलन को सीधे वैश्विक साम्यवादी आंदोलन से जोड़ने की वकालत की। दूसरी ओर, राष्ट्रवादी नेता धीरे-धीरे श्रमिक आंदोलन को राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के अधीन रखना चाहते थे और सीधे राजनीतिक टकराव से बचना चाहते थे। ये वैचारिक दूरियाँ संगठन के लिए चुनौती बन गईं।

  • 1929 का विभाजन: इन वैचारिक मतभेदों के कारण, 1929 में AITUC का पहला बड़ा विभाजन हुआ, जब कुछ राष्ट्रवादी नेताओं, जैसे एन.एम. जोशी और वी.वी. गिरि ने अलग होकर भारतीय ट्रेड यूनियन फेडरेशन (Indian Trade Union Federation - ITUF) का गठन किया। यह विभाजन मुंबई में AITUC के अधिवेशन के दौरान हुआ, जब कम्युनिस्टों ने कई प्रस्तावों पर बहुमत हासिल किया, जिससे उदारवादी और राष्ट्रवादी नेता असहमत हो गए। इसके बाद भी कई बार विभाजन और विलय हुए, जिसके परिणामस्वरूप देश में कई अन्य श्रमिक संगठन जैसे हिंद मजदूर सभा (HMS) (1948 में सोशलिस्ट नेताओं द्वारा) और भारतीय मजदूर संघ (BMS) (1955 में जनसंघ द्वारा) का जन्म हुआ।

  • स्वतंत्रता के बाद: स्वतंत्रता के बाद भी, AITUC ने भारतीय श्रमिकों के अधिकारों के लिए अपना संघर्ष जारी रखा। इसने विभिन्न सरकारों की नीतियों पर प्रभाव डालने और श्रमिकों के कल्याण के लिए कानून बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसने न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा लाभ और बेहतर काम की परिस्थितियों के लिए लगातार वकालत की। आज भी, AITUC भारत के सबसे बड़े और सबसे पुराने केंद्रीय श्रमिक संगठनों में से एक है, जो देश के सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।

प्रमुख अवधारणाएँ

  • ट्रेड यूनियन (Trade Union): यह श्रमिकों का एक ऐसा संगठन होता है जो अपने सदस्यों के हितों, जैसे कि बेहतर मजदूरी, सुरक्षित काम की स्थिति, और उचित लाभ, की रक्षा और प्रचार के लिए काम करता है। यह सामूहिक सौदेबाजी (collective bargaining) के माध्यम से नियोक्ताओं के साथ बातचीत करता है।
  • श्रमिक आंदोलन (Labour Movement): यह श्रमिकों द्वारा अपने अधिकारों और बेहतर कार्य परिस्थितियों के लिए किया जाने वाला एक सामाजिक और राजनीतिक आंदोलन है। इसका उद्देश्य श्रमिक वर्ग के जीवन स्तर और सामाजिक स्थिति को ऊपर उठाना है।
  • अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO): संयुक्त राष्ट्र की एक विशेष एजेंसी है जो अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों को स्थापित करके और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देकर दुनिया भर में श्रमिकों के अधिकारों को आगे बढ़ाने का काम करती है। यह सदस्य देशों को श्रम कानूनों और नीतियों को बेहतर बनाने में सहायता प्रदान करती है।
  • पूंजीवाद (Capitalism): एक आर्थिक प्रणाली जिसमें उत्पादन के साधन (जैसे कारखाने, मशीनें और भूमि) निजी स्वामित्व में होते हैं और लाभ कमाने के लिए संचालित होते हैं। इस प्रणाली में बाजार की शक्तियाँ संसाधनों के आवंटन और कीमतों को निर्धारित करती हैं।
  • साम्राज्यवाद (Imperialism): एक ऐसी नीति जिसमें एक देश अन्य देशों या क्षेत्रों पर अपनी शक्ति और प्रभाव का विस्तार करता है, अक्सर सैन्य बल, आर्थिक प्रभुत्व या सांस्कृतिक श्रेष्ठता के माध्यम से। ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में श्रमिकों का शोषण इसी साम्राज्यवादी व्यवस्था का एक परिणाम था।

इस प्रकार, AITUC की स्थापना न केवल एक ऐतिहासिक घटना थी, बल्कि इसने भारतीय श्रमिक वर्ग को एक पहचान, एक आवाज और अपने अधिकारों के लिए लड़ने का साहस प्रदान किया। इसने भारतीय समाज और राजनीति पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाला है।

मुख्य निष्कर्ष

संक्षेप में, अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) भारतीय श्रमिक आंदोलन का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। यहाँ इसके मुख्य निष्कर्ष दिए गए हैं:

  • स्थापना तिथि: AITUC की स्थापना 31 अक्टूबर, 1920 को मुंबई में हुई थी।
  • पहले अध्यक्ष: लाला लाजपत राय इसके पहले अध्यक्ष थे।
  • प्रेरक कारण: प्रथम विश्व युद्ध के बाद आर्थिक संकट, रूसी क्रांति का प्रभाव, अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) में प्रतिनिधित्व की आवश्यकता और राष्ट्रवादी नेताओं का समर्थन इसकी स्थापना के प्रमुख कारण थे।
  • उद्देश्य: श्रमिकों के हितों की रक्षा, बेहतर कार्य परिस्थितियों की मांग, और राष्ट्रीय आंदोलन में योगदान देना इसके मुख्य उद्देश्य थे।
  • प्रमुख प्रभाव: इसने भारत में श्रमिक संघों को एक मंच प्रदान किया, कई सफल हड़तालों का नेतृत्व किया, और 1926 के ट्रेड यूनियंस अधिनियम जैसे महत्वपूर्ण कानूनी सुधारों में भूमिका निभाई।
  • महत्व: AITUC ने भारतीय श्रमिकों को एक संगठित शक्ति के रूप में उभारा और उन्हें राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय मंच पर अपनी आवाज़ उठाने में सक्षम बनाया, जिससे भारतीय सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य में स्थायी बदलाव आए।

हमें उम्मीद है कि यह विस्तृत जानकारी आपको AITUC की स्थापना और भारतीय श्रमिक आंदोलन में इसके महत्व को समझने में सहायक होगी। यह जानकारी न केवल आपके ज्ञान को बढ़ाएगी, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भी आपके लिए उपयोगी सिद्ध होगी।